सविता एक अच्छी ग्रहणी थी और उसके पति रमेश भी एक अच्छे पति और पिता थे। रमेश और सविता के दो बच्चे थे—बेटा आकाश और बेटी अनामिका। आकाश एक पत्रकार था और अनामिका शिक्षिका।
जब से अनामिका की नौकरी लगी थी, सविता उससे अक्सर कहती, “बेटा, अब शादी कर लो। अगर तुम्हें कोई पसंद हो तो बता दो।”
अनामिका मुस्कुराकर जवाब देती, “मुझे कोई पसंद नहीं है। आप लोग ही देख लो।”
अब घर में अनामिका के रिश्ते की बातें शुरू हो गईं। शादी के लिए उसकी फोटो खिंचवाई गई। फोटो में अनामिका ने साड़ी पहन रखी थी। इसके पीछे भी एक खास वजह थी।
असल में अनामिका की लंबाई थोड़ी कम थी। साड़ी पहनने से यह पता नहीं चलता था कि उसने कितनी इंच की हील वाली चप्पल पहन रखी है।
इस बात पर अनामिका और उसके माता-पिता की सोच अलग थी।
अनामिका कहती, “लड़के वालों को मेरी सही लंबाई पहले ही बता देनी चाहिए।”
लेकिन रमेश और सविता का मानना था, “अगर पहले ही बता देंगे तो लंबे लड़के वाले रिश्ता देखने आएंगे ही नहीं। हो सकता है कि मिलने के बाद उन्हें तुम्हारे दूसरे गुण इतने अच्छे लगें कि लंबाई मायने ही न रखे।”
देखा जाए तो दोनों ही अपनी-अपनी जगह सही थे।
एक दिन उनकी एक रिश्तेदार आंटी ने हँसते हुए अनामिका से कहा, “बेटा, अगर लड़के वाले कहें कि चप्पल उतारकर खड़ी हो जाओ, तो पंजों के बल खड़ी हो जाना। मैंने भी अपनी शादी में ऐसा ही किया था। हमारे जमाने में तो लड़के वाले लड़की को मंदिर में देखने आते थे, वहाँ चप्पल उतारनी ही पड़ती थी। तब भी लंबाई के ऐसे घोटाले हो जाते थे।”
आंटी की बात सुनकर सब हँस पड़े, लेकिन अनामिका को यह सब अच्छा नहीं लगता था। वह रिश्ते की शुरुआत सच से करना चाहती थी।
कुछ समय बाद रमेश और सविता ने शादी की वेबसाइट पर एक लड़का पसंद किया। उसका नाम सागर था। वह भी शिक्षक था। अनामिका को भी उसका प्रोफाइल ठीक लगा।
दोनों परिवारों के मिलने का दिन तय हो गया।
जिस दिन सागर अपने माता-पिता के साथ आने वाला था, उस दिन सविता ने ज़िद करके अनामिका को साड़ी पहनाई और ऊँची हील की चप्पल भी दी।
फिर धीरे से बोली, “अगर चप्पल उतारने को कहें, तो पंजों के बल खड़ी हो जाना।”
अनामिका ने साफ शब्दों में कहा, “मैं ऐसा नहीं करूँगी।”
थोड़ी देर बाद सागर अपने माता-पिता के साथ आ गया। सागर लंबा था। दोनों परिवारों के बीच अच्छी बातचीत हुई। फिर अनामिका और सागर को अकेले में बात करने का मौका दिया गया।
कुछ देर चुप रहने के बाद सागर ने मुस्कुराकर कहा, “मुझे आप पसंद हैं। क्या मैं आपको पसंद हूँ?”
अनामिका ने हिम्मत करके कहा, “मैं आपको एक बात बताना चाहती हूँ। मेरी लंबाई कम है।”
सागर मुस्कुराया और बोला, “मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर आपको पड़ता है तो बताइए।”
यह सुनकर अनामिका के चेहरे पर राहत भरी मुस्कान आ गई।
उसने धीरे से कहा, “मुझे भी आप पसंद हैं।”
कुछ ही समय बाद दोनों का रिश्ता तय हो गया और फिर शादी भी हो गई।
जिस बात को लेकर अनामिका के माता-पिता इतने चिंतित रहते थे, आखिर में वही बात बिल्कुल महत्वहीन साबित हुई। सागर ने अनामिका की लंबाई नहीं, बल्कि उसका स्वभाव, ईमानदारी और समझदारी देखी थी।
तभी तो कहते हैं—रिश्ते बाहरी दिखावे से नहीं, मन की सच्चाई से मजबूत बनते हैं।
