Anju Ka Pitara

मायके से दूरी

एक अनचाहे रिश्ते में बंधी रमा को उसका पति दस साल तक मायके से दूर रखता है — और जब उसे अपनी गलती का एहसास होता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

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रमा आज बहुत खुश थी। उसे देखने लड़के वाले आने वाले थे। रमा एक विद्यालय में शिक्षिका थी। उसके परिवार में माता-पिता, एक भाई और वह स्वयं थी।

थोड़ी देर बाद लड़के वाले आए। लड़के का नाम सागर था। उसके साथ उसके माता-पिता आए थे। सागर भी एक भाई-एक बहन था और उसकी बहन की शादी हो चुकी थी।

रमा और सागर को अकेले में बात करने का मौका दिया गया। दोनों ने एक-दूसरे को पसंद किया, लेकिन बात दहेज पर आकर अटक गई और रिश्ता तय नहीं हो पाया।

इसके बाद दोनों के लिए दूसरी जगह रिश्ते देखे गए, लेकिन कहीं बात नहीं बनी।

लगभग एक साल बाद संयोग से दोनों परिवारों की मंदिर में मुलाकात हुई। बातचीत फिर शुरू हुई और इस बार दोनों परिवार शादी के लिए तैयार हो गए। रमा और सागर से भी पूछा गया। दोनों ने हाँ कर दी और उनकी सगाई हो गई।


लेकिन सगाई होने के कुछ समय बाद सागर को एक शादी में निशा नाम की लड़की पसंद आ गई। अब वह अपने घरवालों से कहने लगा, “सगाई तोड़ दो, मैं निशा से शादी करना चाहता हूँ।”

उसके माता-पिता ने समझाया, “ऐसे रिश्ते बार-बार नहीं बनाए और तोड़े जाते। अब तुम्हारी शादी रमा से ही होगी।”

सागर चुप हो गया और बोला, “ठीक है।”

दो महीने बाद रमा और सागर की शादी हो गई। दोनों घरों में खुशी और तैयारियों का माहौल था। रमा अपनी शादी को लेकर बहुत खुश थी, लेकिन सागर उतना खुश नहीं था। उसे लगता था कि उसकी शादी निशा से होनी चाहिए थी।


शादी के बाद कई बार रमा को महसूस होता कि सागर उससे खुश नहीं है, लेकिन जब भी वह पूछती, सागर कह देता, “ये तुम्हारे मन का वहम है।”

सागर रमा का ज्यादा ध्यान भी नहीं रखता था। रमा विद्यालय की नौकरी और घर के कामों में लगी रहती। उसकी सास हर बात में कमियाँ निकालती रहतीं।

जब कभी रमा सागर से शिकायत करती, वह हमेशा अपनी माँ का पक्ष लेता। “माँ ठीक कहती हैं, तुम सही से काम नहीं करती।”

धीरे-धीरे रमा अंदर ही अंदर टूटने लगी।

एक दिन उसने अपनी माँ को सब कुछ बताया। उसकी माँ ने कहा, “बेटा, तुम बच्चे के बारे में क्यों नहीं सोचती? बच्चा आ जाएगा तो सब ठीक हो जाएगा।”

हमारे समाज में अक्सर औरतों को यही सलाह दी जाती है, जैसे हर समस्या का समाधान सिर्फ बच्चा हो।

रमा ने सोचा शायद माँ ठीक कह रही हैं।


एक साल बाद रमा ने एक बेटी को जन्म दिया। उसका नाम नैना रखा गया। अब रमा का सारा ध्यान अपनी बेटी में रहने लगा।

लेकिन सागर बेटी से भी ज्यादा लगाव नहीं रखता था।

समय बीतता गया। नैना तीन साल की हो गई। तब रमा की सास कहने लगीं, “अब एक बेटा भी हो जाता तो परिवार पूरा हो जाता।”

रमा चुप रह जाती।

एक दिन त्योहार पर रमा के मायके से कुछ सामान आया। सासू माँ उसे लेकर ताने देने लगीं। इस बार रमा ने भी जवाब दे दिया। बात बहुत बढ़ गई।

शाम को जब सागर घर आया तो उसकी माँ ने अपनी तरफ से सारी बातें बताईं। सागर ने बिना रमा की बात सुने उससे कहा—

“तुम्हें फैसला करना होगा। या तो मायका चुन लो या मुझे। अगर मेरे साथ रहना है तो मायके से रिश्ता खत्म करना होगा।”

रमा के पैरों तले जमीन खिसक गई।

लेकिन अपनी छोटी बेटी नैना की खातिर उसने अपने मायके से दूरी बना ली।

अब वह अंदर ही अंदर उदास रहने लगी। सागर को उसकी उदासी से कोई फर्क नहीं पड़ता था।

धीरे-धीरे रमा को यह बात समझ आ गई थी कि अगर पति साथ न दे, तो ससुराल में कोई अपना नहीं होता।

उसके माता-पिता भी बहुत दुखी रहते। एक ही शहर में रहते हुए भी वे अपनी बेटी से खुलकर मिल नहीं सकते थे।


इसी तरह दस साल बीत गए।

एक दिन अचानक रमा के पिता को हार्ट अटैक आया। अस्पताल में वे बार-बार रमा का नाम ले रहे थे।

रमा का भाई उसे लेने ससुराल पहुँचा। उसने सागर से कहा—

“जीजाजी, आप पिताजी को देखने चल रहे हैं या मैं रमा को ले जाऊँ?”

इससे पहले कि कोई कुछ कहता, छोटी नैना बोल पड़ी—

“मामाजी, मैं भी नानाजी के पास चलूँगी।”

नैना की बात सुनकर सागर कुछ पल के लिए चुप रह गया। फिर उसने धीमे स्वर में कहा—

“मैं और रमा भी चलेंगे।”

रमा दस साल बाद अपने पिता से मिलने अस्पताल पहुँची। लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था। अपनी बेटी, दामाद और नातिन को देखने के थोड़ी देर बाद ही उसके पिता ने अंतिम साँस ली।

रमा फूट-फूटकर रोने लगी।

उस दिन पहली बार सागर को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसे समझ आया कि उसने एक बेटी को उसके मायके और माता-पिता से दूर करके कितना बड़ा अन्याय किया था।

उसने रमा से कहा—

“आज के बाद तुम्हें मायके जाने से कोई नहीं रोकेगा। मैं भी तुम्हारे साथ चलूँगा।”

रमा दस साल बाद अपने पूरे परिवार से खुलकर मिली। लेकिन इस मिलन के लिए उसने बहुत बड़ी कीमत चुकाई थी।

अब उसके मायके वाले उसके घर आते-जाते हैं। रमा भी अपने मायके जाती है। सागर भी अब रमा और नैना का पहले से ज्यादा ध्यान रखने लगा है।

उसे अपनी गलती का एहसास है।

वह भगवान से बस यही दुआ करता है कि किसी बेटी को उसके जैसा पति और किसी पिता को उसके जैसा दामाद कभी न मिले।

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